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“कैंसर से भी ज़्यादा ख़तरनाक “मायाचारी की गाँठ” पनपने से रोकता है – उत्तम आर्जव धर्म “

डॉ. इन्दु जैन राष्ट्र गौरव, दिल्ली

“कपट न कीजे कोय, चोरन के पुर ना बसें।
सरल-सुभावी होय, ताके घर बहु-संपदा।।”
अर्थात् कभी भी किसी को छल-कपट नहीं करना चाहिए क्योंकि चोरों के गांव कभी नहीं बसते अर्थात् धन-सम्पत्ति चोरों के यहां नहीं होती वे हमेशा निर्धन ही होते हैं। किन्तु जो जीव सरल स्वभावी होते हैं, उनके घर में संपदा की अपने आप वृद्धि होती है।” पूजा की इन पंक्तियों में कविवर द्यानतराय जी ने सहज-सरल जीवन की महत्ता बताई है।
“ऋजोर्भाव: इति आर्जव:” अर्थात् आत्मा का स्वभाव ही सरल स्वभाव है इसलिए प्रत्येक प्राणी को सरल स्वभाव रखना चाहिए। आत्मा के स्वभाव को प्राप्त करने के लिए हमें मन-वचन-काय से पर पदार्थों से विरक्ति का भाव अपनाते हुए स्वयं में रत रहना होगा तभी हमारी आत्मा सरल स्वभाव को प्राप्त कर पाएगी। मन-वचन-काय पूर्वक कुटिलता का त्याग करना ही आर्जव धर्म है।
“आर्जव अर्थ सरलता जान,सच्चे मनुष्य की पहचान,
त्याग कपटता बनो महान् , पा जाओगे सुख की खान ।।”
जैसे आईने में वही दिखाई देता है जो सामने है यदि अच्छा है तो अच्छा और यदि बुरा है तो बुरा। कितना भी आईना साफ कर लीजिए यदि स्वयं में दाग है तो वो दिखाई ही देगा और स्वयं का दाग हटाते ही पुन: अच्छा स्वरूप दिखाई देने लगेगा। ऐसे ही यदि जीवन के आईने में आत्मदर्शन करना चाहते हैं तो मायाचारी जैसी सभी बुराइयों को त्यागना होगा। यदि जीवन में सुख की चाह है तो धर्म के लक्षण “उत्तम आर्जव” को जीवन में धारण कीजिए।
छल-प्रपंच से दूर रहने की निरंतर साधना करना अत्यंत आवश्यक है।
“बुद्धि तेरी बड़ी विलक्षण ,बात समझता सबके मन की।
पर उल्टी सीधी बात मानकर, खाल खींचता भोले जन की।।
जीवन सुख को चाहने वाला, छल प्रपंच से रहता दूर ।
तन,मन,बुद्धि शुभ के अर्पण,सुख प्रदान करती भरपूर।।”
सहज-सरल व्यक्ति के जीवन में कुटिलता के लिए कोई स्थान नहीं होता है। वह अपने सहज-सरल जीवन की पोथी के एक-एक पन्ने में अध्यात्म, सुकून,आनंद के क्षण लिखता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में यदि कठिनाइयाँ भी आती हैं तो वो समताभाव धारण करके सहज ही उनको दूर कर देता है। जिसके मन में ऋजुता का भाव प्रकट होता है वह सुख और दुख दोनों ही परिस्थितियों में सहज रहता है। किन्तु कुटिल व्यक्ति सरलता के स्वभाव के ऊपर कुटिलता और मायाचारी का पर्दा लगा लेता है और अपने वास्तविक स्वभाव को पहचानना ही नहीं चाहता है। कुटिल व्यक्ति की मन: स्थिति बहुत विचित्र होती है वह कोई भी कार्य सहजता से नहीं करता। मन सहज और सरल न होने से वह दूसरों पर और स्वयं पर अविश्वास करके सभी कार्यों में विघ्न उत्पन्न करता है। कहा भी गया है कि – “माया तिर्यग्योनस्य” अर्थात् मायाचारी से तिर्यञ्चगति का बंध होता है। क्या ? ऐसी कुटिलता के साथ मनुष्य जीवन को निरर्थक करना समझदारी है ? इस बारे में ज़रा सोचकर देखिए और यदि मन का उत्तर नकारात्मक आए तो समझ लीजिए कि अब वो समय आ गया है जब आपको कुटिलता का बाहरी आवरण छोड़कर, जीवन की स्वाभाविक सरलता को प्रकट करना है और इसके लिए “उत्तम आर्जव” की साधना करनी है।
“दसधम्मसारो” पुस्तक में डॉ.अनेकान्त जैन ने प्राकृत भाषा की गाथा के माध्यम से “उत्तम – अज्जवं” को समझाया है –
“अच्जवप्पसहावो य मायाभावे य जायइ अप्पम्मि ।
मिच्छत्तस्साभावे जहा य सम्मत्तं हवइ अप्पम्मि ।।”
अर्थात् “आर्जव आत्मा का स्वभाव है, वह माया कषाय के अभाव स्वरूप आत्मा में उत्पन्न होता है जैसे मिथ्यात्व के अभाव में सम्यक्त्व आत्मा में प्रगट होता है।”
निश्चित है कि मायाचारी व्यक्ति कभी भी धर्म को धारण नहीं कर सकता। धर्म को मन में स्थापित करने के लिए उसे छल-कपट, दिखावा आदि सभी बुराइयों को त्यागना होगा।
स्वामकीर्त्तिकेयानुप्रेक्षा में लिखा है कि
“जो चिंतेइण वंकं ण कुणदि वंकं ।
ण य गोवदि णिय दोसं अज्जवधम्मो हवे तस्स ।।”
अर्थात् जो कुटिल विचार नहीं करता, कुटिल कार्य नहीं करता और कुटिल बात नहीं बोलता तथा अपना दोष नहीं छिपाता, उसके आर्जव धर्म होता है।

अत: छल, कपट, मायाचारी, ढोंग, बनावट एवं कृत्रिमता आदि को अपने जीवन से निकालने का प्रयास कीजिए और इन सभी से रहित जीवन आचरण में उत्तम आर्जव धर्म को प्रकट कीजिए तभी हमारे जीवन की सार्थकता है। हम कह सकते हैं कि आर्जव धर्म जीवन की पोथी को सहज और सरल तरीके से पढ़ना-लिखना-समझना सिखाता है जिससे हम धर्म के सोपान पर अपना क़दम मज़बूती से रखते हुए आगे बढ़ सकते हैं।

“बाहर भीतर एक सा, सरल स्वच्छ व्यवहार,
कथनी-करनी एक सी, यही आर्जव धर्म का सार।।”

(जाप मंत्र -ऊँ हृीं उत्तम आर्जव धर्मांगाय नम:)

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