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सरस्वती राजमणि एक स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें वो सम्मान नहीं मिला जिनकी वो हक़दार थी

आज हम एक महान स्वतंत्रता सेनानी महिला के जीवन का परिचय करेंगे जिन्हें वो सम्मान नहीं मिला जो आजादी के बाद उनको मिलना चाहिए था. उन महान स्वतंत्रता सेनानी महिला का नाम है सरस्वती राजमणि.


सरस्वती राजमणि का जन्म 11 जनवरी 1927 को रंगून, बर्मा में स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार में हुआ. उनके पिता की सोने की खान थी, वह रंगून, बर्मा के सबसे अमीर आदमी थे. उनका परिवार स्वतंत्रता आन्दोलन के समर्थक थे. उनके परिवार ने इस आन्दोलन में बड़ी धनराशी का भी सहयोग किया.


बहुत ही कम उम्र लगभग 16 वर्ष की आयु में वह सुभाषचंद्र बोस के भाषण से प्रेरित होकर, सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज को अपने आभूषण दान कर देती है . जब ये बात सुभाष चन्द्र बोस को पता चलती है तो वह सोचते है कि सरस्वती राजमणि एक मासूम लड़की है कही उसने मासूमियत में तो अपने आभूषण दान नहीं कर दिए. वह सरस्वती राजमणि को बुलाते है और उनके आभूषण उनको वापस करते है, लेकिन सरस्वती राजमणि कहती है कि वो अपनी पुरे होशोहवास में अपने आभूषण देश कि आज़ादी के लिए दे रही है.


1942 में उनको आज़ाद हिन्द फौज की झांसी की रानी रेजिमेंट में भर्ती किया गया. उनको रेजिमेंट में गुप्तचर विभाग में रखा गया. उन्हें पहली भारतीय महिला जासूस कहा जाता है. उन्होंने एक लड़के के भेष में ब्रिटिश सेना के शिविरो और घरो में काम किया. वहां की सारी गुप्त जानकारी आज़ाद हिन्द फौज को भेजती रही. उनके साथ अन्य महिला सहयोगी भी थी जो लडको के रूप में उन्ही की भांति कार्य कर रही थी. 1943 में उन्होंने एक बहुत बड़ी अंग्रेजो के षड्यंत्र की सुचना आज़ाद हिन्द फौज को दी, जो सुभाषचंद्र बोस की हत्या से सम्बंधित थी. अंग्रेजो की प्लानिंग थी कि जब सुभाषचंद्र बोस सीमा का गुप्त दौरा करेंगे तो उनकी हत्या कर दी जाए.

सरस्वती राजमणि एक स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें वो सम्मान नहीं मिला जिनकी वो हक़दार थी


उन्होंने दो वर्ष तक लड़का बनकर सारी गुप्त जानकारी आज़ाद हिन्द फौज को दी. उनके गुप्तचर के कार्यकाल में उनकी एक सहयोगी को अंग्रेजो ने पकड़ लिया और जेल में डाल दिया. अपनी सहयोगी को बचाने के लिए उन्होंने एक नर्तकी का रूप धारण कर, सम्बंधित अधिकारी को नशीला पदार्थ पिला कर, अपनी सहयोगी को जेल से छुड़ा कर ले गयी. इस बीच एक गार्ड ने उनके पैर में गोली मार दी. लेकिन उन्होंने फिर भी हार नही मानी और अंग्रेजो के पकड़ में नहीं आई. वह सफलतापूर्वक अपनी सहयोगी को जेल से छुड़ाकर ले गयी.


इतनी महान स्वतंत्रता सेनानी को आज़ादी के बाद एक गुमनाम जिंदगी जीनी पड़ी. आजादी के बाद, लंबे समय तक वह चेन्नई में एक जर्जर और एक तंग कमरे के अपार्टमेंट में अकेली रहती रहीं, जो केवल नेताजी सुभाषचंद्र बोस की तस्वीरों से सजा था. जो स्वत्रंतता सेनानी की पेंशन मिलती थी वो बहुत कम थी. जिससे उनको खाने पीने के लाले पड़ गए थे. आख़िरकार उन्हें उस समय की मुख्यमंत्री जयललिता जी से आर्थिक मदद की गुहार लगानी पड़ी. उन्हें यह सब, हमारे देश की राजनीतिक षड्यन्त्र कहें या राजनेताओं का सिर्फ अपना राजनीतिक लाभ देखने के कारण, ये सब समस्या झेलनी पड़ी. 13 जनवरी 2018 को उनका देहांत हो गया.

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