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लाचित बोडफुकन एक महान सेनापति जिसने असम से मुग़ल शासन हटा दिया

आज हम असम के महान सेनानायक लाचित बोडफुकन की वीरता का गुणगान करेंगे. जिन्होंने असम से मुग़ल को हराकर फिर से असम को अपने राजा चक्रध्वज सिंह के अधीन करा दिया. आइए उनकी वीरता की गाथा सुने.


लाचित बोड़फुकन, मोमाई तामुली बोड़बरुआ के पुत्र थे, जो कि प्रताप सिंह के शासन-काल में पहले बोड़बरुआ थे। लाचित बोड़फुकन ने मानविकी शास्त्र और सैन्य कौशल की शिक्षा प्राप्त की थी। उन्हें अहोम स्वर्गदेव के ध्वज वाहक का पद सौंपा गया था, जो कि किसी महत्वाकांक्षी कूटनीतिज्ञ या राजनेता के लिए पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता था। बोड़फुकन के रूप में अपनी नियुक्ति से पूर्व लाचित अहोम राजा चक्रध्वज सिंह की शाही घुड़साल के अधीक्षक, रणनैतिक रूप से महत्वपूर्ण सिमुलगढ़ किले के प्रमुख और शाही घुड़सवार रक्षक दल के अधीक्षक के पदों पर आसीन रहे थे।

लाचित बोडफुकन एक महान सेनापति जिसने असम से मुग़ल शासन हटा दिया


राजा चक्रध्वज ने गुवाहाटी के मुग़लों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए सेना का नेतृत्व लाचित बोफुकन को दिया. राजा ने लाचित को सोने की मूठ वाली एक तलवार और विशिष्टता के प्रतीक पारंपरिक वस्त्र उपहार किए थे। लाचित ने सेना एकत्रित की और 1667 ई. की गर्मियों तक तैयारियां पूरी कर लीं । लाचित ने मुग़लों के कब्ज़े से गुवाहाटी को फिर से जीत लिया और सराईघाट की लड़ाई में वे इसकी रक्षा करने में सफल रहे। सराईघाट की विजय के लगभग एक वर्ष बाद बिमारी के कारण लाचित बोड़फुकन की मृत्यु हो गई।


उनका मृत शरीर जोरहाट से 16 किमी दूर हूलुंगपारा में स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह द्वारा सन 1672 में निर्मित लचित स्मारक में है। लाचित बोड़फुकन की कोई फोटो उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनकी आकृति का वर्णन इस प्रकार है, उनका मुख चौड़ा है और पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह दिखाई देता था । कोई भी उनके चेहरे की ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता था।


लाचित और उनकी सेना द्वारा पराजित होने के बाद, मुग़ल सेना ब्रह्मपुत्र नदी के रास्ते ढाका से असम की ओर चली और गुवाहाटी की ओर बढ़ने लगीं। रामसिंह के नेतृत्व वाली मुग़ल सेना में 30,000 पैदल, 15,000 तीरंदाज़, 18,000 तुर्की घुड़सवार, 5,000 बंदूकची और 1,000 से अधिक तोपों के अलावा नौकाओं का विशाल बेड़ा था। लड़ाई के पहले चरण में मुग़ल सेनापति रामसिंह असमिया सेना के विरुद्ध कोई भी सफलता पाने में विफल रहा।


जब राम सिंह लाचित बोडफुकन के नेतृत्व वाली सेना से जीतने में असमर्थ था तो उसने लाचित को राजा चक्रध्वज की नजर में गिराने की योजना बनाई, उसकी योजना के अनुसार वह लाचित बोडफुकन को राजा चक्रध्वज द्वारा सौपी गयी सेना के नेतृत्व से हटाना चाहता था जिसके लिए रामसिंह ने एक पत्र के साथ अहोम शिविर की ओर एक तीर छोड़ा, जिसमें लिखा था कि लाचित को एक लाख रुपये दिये गये थे और इसलिए उसे गुवाहाटी छोड़कर चले जाना चाहिए। यह पत्र जब अहोम राजा चक्रध्वज सिंह के पास पहुंचा तो राजा को लाचित की निष्ठा और देशभक्ति पर संदेह होने लगा, लेकिन उनके प्रधानमंत्री अतन बुड़गोहेन ने राजा को समझाया कि यह लाचित के विरुद्ध एक षड्यंत्र है। जिससे राजा चक्रध्वज का संदेह दूर हुआ और लाचित बोडफुकन को सेना का नेतृत्व सौपे रखा.

सराईघाट की लड़ाई में, जब मुग़लों ने सराईघाट की लड़ाई के आंखिरी क्षण में नदी से आक्रमण किया, तो असमिया सैनिको का हौसला टूटने लगा । कुछ सैनिक युद्ध छोड़कर भाग गए । लाचित बोडफुकन गंभीर रूप से बीमार थे, फिर भी वे एक नाव में सवार हुए और सात नावों के साथ मुग़ल बेड़े की ओर बढ़े। उन्होंने अपने सैनिकों से कहा, अगर आप लोग भागना चाहते हैं, तो भाग जाएं। महाराज ने मुझे यह कार्य सौंपा है जिसे मैं अच्छी तरह पूरा करके रहूँगा। उन्होंने अपने सैनिको से कहा में मुग़लों को बंदी बनाकर लाऊंगा. आप महाराज को सूचित करना कि उनके सेनाध्यक्ष ने उनके आदेश का पालन करते हुए पुरे कर्तव्यनिष्ठा के साथ युद्ध लड़ा. उनके सैनिक सेनाध्यक्ष की यह बातें सुनकर युद्ध लड़ने को तैयार हो गए और ब्रह्मपुत्र नदी में एक भीषण युद्ध हुआ। ब्रह्मपुत्र नदी में अहोम सेना और मुगलों के बीच ऐतिहासिक लड़ाई हुई, जिसमें लाचित ने पानी में लड़ाई (नौसैनिक युद्ध) की सर्वथा नई तकनीक आजमाते हुए मुगलों को पराजित किया। जिसमे लाचित बोड़फुकन और उनकी सेना विजयी हुए। जिसके कारण मुग़ल सेना गुवाहाटी से पीछे हट गईं। उन्होंने अपने भौगोलिक-मानविकी ज्ञान और गुरिल्ला युद्ध की बारीक रणनीतियों का प्रयोग करते हुए सर्वप्रथम मुगल फौज की ताकत का सटीक आकलन किया और फिर ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर भीषण नौसैनिक युद्ध में उन्हें हरा दिया। लाचित ने अपनी मौलिक युद्धनीति के तहत रातोंरात अपनी सेना की सुरक्षा हेतु मिट्टी से दृढ़ तटबंधों का निर्माण कराया। उन्होंने मातृभूमि और देशवासियों के स्वाभिमान और हित को अपने सगे-संबंधियों से सदैव ऊपर रखा। अत: युद्धभूमि में अपने मामा की लापरवाही को अक्षम्य मानकर उनका गला काट कर वध कर दिया और कहा कि ‘मेरे मामा मेरी मातृभूमि से बढ़कर नहीं हो सकते’।

मुग़ल सेनापति ने अहोम सैनिकों और अहोम सेनापति लाचित बोड़फुकन के हाथों अपनी पराजय स्वीकार करते हुए लिखा, “महाराज की जय हो! सलाहकारों की जय हो! सेनानायकों की जय हो! देश की जय हो! केवल एक ही व्यक्ति सभी शक्तियों का नेतृत्व करता है! यहां तक ​​कि मैं रामसिंह, व्यक्तिगत रूप से युद्ध-स्थल पर उपस्थित होते हुए भी, कोई कमी या कोई अवसर नहीं ढूंढ सका।”


लाचित बोड़फुकन के पराक्रम और सराईघाट की लड़ाई में असमिया सेना की विजय का स्मरण करने के लिए संपूर्ण असम में प्रति वर्ष 24 नवम्बर को ‘लाचित दिवस’ मनाया जाता है। ‘राष्ट्रीय रक्षा अकादमी’ के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को ‘लाचित मैडल’ से सम्मानित किया जाता है, जिसका नाम लाचित बोड़फुकन के नाम पर रखा गया है।


पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने असमिया युद्ध नायक की 400 वीं जयंती समारोह की शुरुआत की थी और एक युद्ध स्मारक और कमांडर की 150 फुट की कांस्य प्रतिमा की नींव रखी थी.


अपने 99वें मन की बात संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी वीर लाचित बोडफुकन का गुणगान करते हुए कहा, ”मैं असम की एक कहानी साझा करना चाहूंगा, जो एक भारत, श्रेष्ठ भारत की थीम को भी बढ़ावा देती है।” “आप सभी जानते हैं कि हम वीर लाचित बोडफुकन की 400वीं जयंती मना रहे हैं। उन्होंने असम को मुगलों के क्रूर शासन से मुक्ति दिलाई थी। आज देश को उनकी वीरता के बारे में पता चल रहा है. हमने उनके जीवन पर एक निबंध लेखन प्रतियोगिता भी आयोजित की.”


भारत एक वीरो और वीरांगनाओ का देश है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए, हमे अपने भारत के ऐसे सपूतो पर गर्व होना चाहिए.

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